गली मुहावरों वाली सबको राह दिखाती लंबा पर सही रास्ता ही है जो बस है ठीक। गली मुहावरों वाली सबको यह सिखाती अक्लमंद को इशारा काफ़ी। गली मुहावरों वाली सबसे करे सवाल क्या कभी ना सुना है मखमल के गलीचों पर टाट के पैबंद नहीं लगते? या नाच ना जाने आँगन टेढ़ा ? क्या कभी ना सुना है अधजल गगरी छलकत जाए ? या कागज़ की नाव नहीं चलती ? क्या देखा है कभी जलेबी सा सीधा व्यक्तित्व ? या हथेली पर सरसों उगते? क्या कभी किस्से कहानियों से बाहर देखा है अलादीन का चिराग ? या बड़ी-बड़ी बातों से पेट भरते ? क्या हाँ की जगह ना और ना की जगह हाँ हो सकती है ? या रात की जगह दिन और दिन की जगह रात ले सकती है ? यह है गली मुहावरों वाली जो अज्ञान की निद्रा से हमें जगाती और हमें है यह बताती लंबा टीका मधुर बानी दगाबाज़ की यही निशानी और देख ,समझ और पहचान ले उसको जिसके हाथ में माला पर दिल में है भाला। झूठे दोस्त से खुला दुश्मन भला और तिलक लगाने से ना हर कोई संत बना। गली मुहावरों वाली सबको यह चेताती दो गज की बना लो उनसे दूरी जिन्हें आता हैं तिल का ताड़ बनाना । जिनके मुँह में राम पर है बगल में छूरी। जिन्हें आता है पराई आग ...